पुकार (@ १७/२/२०१९, नाशिक)

हे ईश्वर, प्रभु, हे जग-पालक,
ब्रह्मांड-विधि के संचालक!
हे दया-सिंधु, करुणावतार,
सुन लो विक्षुब्ध मन की पुकार!

नहीं अतिशयोक्ति यह पालनहार,
चहुँ-ओर मचा है हाहाकार!
जा रही गर्त में सृष्टि है,
कहीं सूखा, कहीं अतिवृष्टि है!

छाई अत्यंत निराशा है,
केवल तुम्हरी ही आशा है।
नर-शोणित का नर प्यासा है,
अनुचित कैसी ये पिपासा है!

हे घट-घट वासी, अन्तर्यामी,
आपदा प्रबंधन के स्वामी!
करबद्ध खड़े हम विनत-भाव,
दे दो दृष्टि का कुछ प्रभाव!

भर जाएं सभी के मन के घाव,
मानवता का हो फिर बहाव!
फिर धरा का आँचल भर जाए
औ' हिन्द की सभ्यता तर जाए।

हर पुरुष राम सा विकसित हो,
हर स्त्री सीता सी महान रहे।
जब तक नभ में यह सूर्य रहे,
अक्षुण्ण ये हिंदुस्तान रहे।।

-©असीम शेखर


A humble tribute to the martyrs of Pulwama! The nation is proud of you brave-hearts. Salute!
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फिर कैसे अब रुक सकता हूँ (@ ०९/०२/२०१९, नाशिक)

गिर गिर कर सीधा खड़ा हुआ,
फिर कैसे अब झुक सकता हूँ?
कुछ सपने लेकर चला हूँ जो,
फिर कैसे अब रुक सकता हूँ?

माना सूरज सा तेजस्वी नहीं,
पर दीपक सा जल सकता हूँ।
ब्रह्मांड उजागर न भी करूं
पर, घर रोशन कर सकता हूँ।।

हूँ वृक्ष नहीं उस भूमि का,
जिसको बारिश ने सींचा है।
सूखे में पनपा तिनका हूँ,
बंजर से जीवन खींचा है।।

हैं ज़ुल्म पास जितने तेरे,
सहने की ताक़त रखता हूँ।
पत्थर पर लिखी लिखावट हूँ,
शीशे से कहाँ मैं डरता हूँ!!

हूँ रचा स्वयं खुद से खुद को,
फिर मिटने का डर कैसा है!
तप-तप कर वक़्त की भट्टी में,
निखरा तन कुंदन जैसा है।।

ताने जितने भी मार लो तुम,
सच कहने का दम रखता हूँ।
कुछ सपने लेकर चला हूँ जो,
फिर कैसे अब रुक सकता हूँ!!

- ©असीम शेखर

एक ज़माना बीत गया (@ २७/१२/२०१४ , बंगलौर)

आज उनसे बिछङे हमको
एक ज़माना बीत गया।

चेहरे पर तेजस्वी आभा
होंठों पर मुस्कान मंद,
छरहरी,ऊँची कद-काठी
हाथ छङी औ’ चाल बुलंद।

देखे उस मुखर अनीक को
एक ज़माना बीत गया।
आज उनसे बिछङे हमको
एक ज़माना बीत गया।।

प्रातः ब्रह्म वेला में उठ कर
भजन स्फुटित होता मुख से,
फिर प्रभात-सैर को जाना
शामिल था दिनचर्या में।

प्रातः “विनय भजन” गूँजन को
एक ज़माना बीत गया।
आज उनसे बिछङे हमको
एक ज़माना बीत गया।।

अनुशासन अत्यंत प्रिय था
पर मखमल सा कोमल हृदय था,
खङाऊं की खटखट सुनते, सब
व्यवस्थित हो जाना निश्चय था।

आज खङाऊं की खटखट को
एक ज़माना बीत गया।
आज उनसे बिछङे हमको
एक ज़माना बीत गया।।

– ©असीम शेखर

अत्यंत पूजनीय परनानाजी स्व. बाबू अम्बिका प्रसाद के 27वीं पुण्यतिथि पर रचित।

जीवन इतना आसान नहीं! (@ १२/०९/२०१४, बंगलोर

जीवन इतना आसान नहीं||

हैं राह कई सीधे-टेढ़े, उलझी-सुलझी कुछ बातें हैं|
सर ऊँचा कर के चले कभी, तो गह्वर से टकराते हैं|
कब सामने क्या आ जाएगा, लगता कुछ भी अनुमान नहीं,
दिखने मे सरल तो है लेकिन, जीवन इतना आसान नहीं||

है आसमान सा अंतहीन, सागर के जैसा गहरा है|
लाख संजोने पर भी यहाँ, टूटे हर ख्वाब सुनहरा है|
इस पाने खोने की पहेली को, है समझ सका इंसान नहीं,
दिखने मे सरल तो है लेकिन, जीवन इतना आसान नहीं||

हर किसी के कितने चेहरे हैं, हर चेहरे के पीछे चेहरा!
क्या पता कौन कब दे जाए, हृदय पर घाव कोई गहरा!
हर पल डर है कि प्रीत दिखा, ले जाए कहीं कोई प्राण नहीं,
दिखने मे सरल तो है लेकिन, जीवन इतना आसान नहीं||

– © असीम शेखर

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माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है! (@ ११/०५/२०१४, बंगलोर)

माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है!

माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है,
तुझसे दूर तो खुशियाँ भी बद-रंग हैं|
तू ही है धूरी मेरे संसार की,
सीखा तुझसे जीने का ढंग है|

माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है!!

तेरी बनाई रोटी भी पकवानों सा मिठास देती है,
हर क्षण तेरे अतुलनीय प्रेम का आभास देती है|
तेरी गोद मे स्वर्ग सा आनंद नसीब होता है,
तेरी आँखों की चमक का अलग ही एक तरंग है|

माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है!!

माँ, दिया है तुमने हौसला मुझे हर कदम पर,
आज इस मुकाम पर हूँ तेरे बढ़ावे के दम पर|
तेरी बातें हर बार हिम्मत बढ़ा जाती हैं,
ऐसा अनोखा तेरे समझने का ढंग है|

माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है!
माँ, तू है तो दुनिया मे रंग है!!

-© असीम शेखर

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