निमंत्रण (@१८/१/२०१७, बैंगलोर)

आओ, कि जीवन में तुम्हारा स्वागत है,
पर आओ तो जाने के लिए मत आना!
आओ, कि मुझे तुम्हारी भावनाओं की कद्र है,
पर सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना!

तुम्हारे आने की ख़ुशी इतनी है
कि मैंने पलकों पर तमन्नाओं की रंगोली सजा रखी है,
दिल में उम्मीदों की शम्में जला रखी है,
आओ, पर शम्में बुझाने के लिए मत आना।

लोग अक्सर आने का वादा कर के बंध जाते हैं,
तुम सिर्फ वादा निभाने के लिए मत आना।
आओ, कि जीवन में तुम्हारा स्वागत है,
पर आओ तो जाने के लिए मत आना!

- ©असीम शेखर
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बीती पर रोकर क्या होगा! (@२०/०५/२०१८, बेंगलुरू)

एक लक्ष्य को आधारित कर के, कुछ आशाओं के धागों से,
कुछ मंसूबों - तदबीरों से, आलेख - प्रयास के भागों से,
लेकर के दृढ़ मन से निश्चय, उद्देश्य को तुमने साधा था,
जग रात - रात मेहनत कर के, अपने सपनों को बांधा था।

वह लक्ष्य जो पास ही दिखता था, था दूर कहीं वह तारों सा,
जब हाथ बढ़ाकर नहीं मिला, मन पिघल गया बेचारों सा!
जब लक्ष्य चूकता है मानव, दोषी ठहराता किस्मत को,
व्याकुल कर अपने अंतर को, कुंठित करता जाता मन को।

कुंठित मन से न निकलता हल, मन को पहले उजियार करो
असफलता सीख है हार नहीं, इस तथ्य को तुम स्वीकार करो,
करने को आगे बहुत पड़ा, यूँ थक जाने से क्या होगा?
बढ़कर कमियों से युद्ध करो, बीती पर रोकर क्या होगा!

- ©असीम शेखर

बचपन की वो शाम फ़िर क्यों नहीं आती है? (@ ०३/०७/२०१९, नाशिक)

बचपन की वो शाम फ़िर क्यों नहीं आती है?

वो शाम जब दादाजी के हाथ पकड़,
नन्हे कदमों से शहर को नाप आया करते थे,
वो शाम जब मैदान में जमे बारिश के पानी में
हम बच्चे कागज़ की नाव चलाया करते थे।।

वो शाम जब हम खुद से बड़ा बल्ला लिए
गलियों में खेलने निकल जाया करते थे,
और पापा के स्कूटर की आवाज़ मिलते ही
हाथ पैर धोकर पढ़ने बैठ जाया करते थे।।

वो शाम जिनमें नाश्ते का मतलब
माँ के हाथ का बना पोहा और निमकी होता था,
और वो शाम जब सर के दर्द का इलाज़
दादीमाँ की प्यार भारी थपकी से होता था।।

कुछ तो खास बात थी उन बीते शामों में,
कि उन पुराने दिनों की याद सताती है।
आज ज़िंदगी की उलझनों से बचाने को
बचपन की वो शाम फ़िर क्यों नहीं आती है?

- ©असीम शेखर


Happylife

उनकी मुस्कान नहीं बदली (@ ०३/०७/२०१९, नाशिक)

चीज़ें बदलीं, दुनिया बदली, उनकी मुस्कान नहीं बदली।
निस्वार्थ निरंतर अनुराग की उनकी रुझान नहीं बदली।।

सुख दुःख में सम रहने की उनकी मिसाल नहीं बदली।
सीख भरी प्यारी बातों की भंडार विशाल नहीं बदली।।

कोमल हृदय, निर्दोष नयन, नयनों की भाव नहीं बदली।
मंद मुस्कराहट में लिपटी सच्ची बातों की बहाव नहीं बदली।।

उम्र के साथ शरीर थका, पर दिनचर्या नहीं बदली।
बच्चों के संग रिझ जाने की उनकी प्रकिया नहीं बदली।।

सबको जोड़े रखने वाली उनकी व्यवहार नहीं बदली।
"फिर कब आना होगा" की वह विनीत पुकार नहीं बदली।।

समय के चोट पड़े पर उनकी हस्ती महान नहीं बदली।
चीज़ें बदलीं, दुनिया बदली, उनकी मुस्कान नहीं बदली।।

- ©असीम शेखर

संवेदनशीलता, सादगी, अनुराग एवं संयम के प्रतिमूर्ति प्यारे दद्दू को समर्पित।

कस्तूरी (नाशिक, @ ३१/१२/२०१८)

जो तुम्हें कस्तूरी की खुशबू का नाम दिया है तो क्या गलत किया है?
हाँ, रहते हो साँसों में बसकर तुम, पर हमारे मिलने की उम्मीद क्या है?

पहली बार तुम्हारे होने का एहसास होने पर
बहुत दौड़ा था, कुलांचे मारा था मन का ये मृग।
तुम्हें पाना जो चाहता था, अपना बनाना जो चाहता था!
पर फिर एहसास हुआ - तुम्हारे पहुंच से परे होने का,
और थका हुआ, कुम्हला कर हार गया मन का ये मृग।

तब से लेकर आज तक, हर पल, हर रोज़ तुम्हारी सुगंध का एहसास करता हूँ,
तुमसे मिल पाने की नाकाम कोशिश, व्यर्थ आस करता हूँ। 
और अब यही आस सोज़ बन कर मन के मृग को जला रही है,
इतना, कि अब साँसे रोक लेने को साँसों में सुगंध महसूस करने से आसान समझता हूँ।।

जो तुम्हें कस्तूरी की खुशबू का नाम दिया है तो कुछ गलत नहीं है,
कि तुम रहते तो हो सांसो में घर कर के, पर मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।

- ©असीम शेखर